बुधवार, 11 मई 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए  
संपादन: डॉ. सुमीता                    सन् 1985 से प्रकाशित      नवांक 3, अप्रैल 2016


संवाद:
आजकल हमारे राज्य में पंचायत चुनाव की सरगर्मी जोरों पर है. जहाँ जनता ही शासक हो, राजकाज की ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता और शक्ति संभालने की जिम्मेदारी देश के सभी नागरिकों में समान रूप से बंटी होती है. देश का हरेक वयस्क नागरिक राजकाज में भागीदार बन सके, इसे सुनिश्चित करने के लिए ही हमारे देश में पंचायती राज की व्यवस्था है. यानी नियत चुनावी प्रक्रिया द्वारा पंचायतों में ऐसे प्रतिनिधियों का चयन करना जो पंचायत स्तर पर ग्रामीण समाज को सुव्यवस्थित और विकसित करने का कार्यभार सुरुचि, ईमानदारी और जिम्मेदारीपूर्वक निभा सकें.

इसका सीधा अर्थ यह है कि देश का हर नागरिक इतना जागरुक और समझदार हो कि वह चयन के मामले में सही निर्णय ले सके. वह खुद की और अपने समाज के विकास की दिशा निर्धारित कर सकने के साथ ही अपना यथाशक्ति योगदान कर पाने में भी सक्षम हो सके. आखिर उसका समाज, गाँव, राज्य, राष्ट्र उसी का है और उसे खुद ही इसकी देखभाल करनी है और सर्वांगीण विकास के रास्ते पर इसे आगे बढ़ाना है. लेकिन दुखद वस्तुस्थिति तो यही है कि आज भी हमारी जनता को कुछ स्वार्थी किस्म के सत्तालोलुप व्यक्तियों द्वारा ढोरों-भेड़ों की तरह किसी भी दिशा में हाँक लिया जाता है. इसका कारण जनता की अशिक्षा, गैर-जागरूकता और अपनी शक्ति से अनजान होना ही तो है. प्रसिद्ध कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ के शब्दों में:
(जनता) एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती जाती हवा की जुबान में
हाँ ऽ ऽ हाँ ऽ ऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से डरता है.

अपनी राजनीतिक सहभागिता को हल्के में लेना या भय अथवा लोभवश मताधिकार का दुरुपयोग करना सबसे पहले स्वयं के और उसके बाद नागरिक कर्तव्यों के प्रति किया गया द्रोह ही है जो सर्वथा अनुचित है. हम सभी  सचेत और जिम्मेदार नागरिक बन सकें इस कामना के साथ ...
*****

इस अंक की विशेष पेशकश है बाबा नागार्जुन की एक कविता और कवि दुष्यंत कुमार का एक मौजूं शेर:
बातें

बातें-
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चन्दन में बसी हुईं
बातें-
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य बंधन में कसी हुईं
बातें-
उसाँस में झुलसीं
रोष के आँच में तली हुईं
बातें-
चुहल में हुलसीं
नेह-साँचे में ढली हुईं
बातें- विष की फुहार-सी
बातें- अमृत की धार-सी
बातें- मौत की काली डोर-सी
बातें- जीवन की दूधिया हिलोर-सी
बातें- अचूक वरदान-सी
बातें- घृणित नाबदान-सी
बातें- फलप्रसू, सुशोभन, फल-सी
बातें- अमंगल विष-गर्भ शूल-सी
बातें-
क्या करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें-
यही अपनी पूँजी, यही अपने औजार
यही अपने साधन, यही अपने हथियार
बातें-
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें-
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, जिक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?    
   *****
“पक गई हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो, ऐसे गुजर होगी नहीं. “

जरा सोचिए ...

क्या हमारा समाज हमारे गुजर-बसर करने अर्थात हमारे जीने के लायक है? यानी क्या यह अपने सदस्यों के व्यक्तित्व और चेतना का पूरा विकास कर पाने में समर्थ है? आइए, अपने परिवेश पर एक नजर डालते हैं:
·         क्या आपने अपने बच्चों को कभी ध्यान से देखा है – मैले-कुचैले फटे कपड़े पहने, हाथ में भोजन के लिए बर्तन लेकर आपस में गाली-गलौज करते हुए स्कूल जाते बच्चे. क्या यही विकसित समाज है? क्या आपने कभी सोचा है कि स्कूल छोड़ने के बाद उन बच्चों की दशा और दिशा क्या होगी?
·         खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के बावजूद इन क्षेत्रों में आपकी कितनी भागीदारी होती है? गाँव में रहते हुए गाँव के लोगों के सहयोग से इन क्षेत्रों कोई कितना आगे निकल पाया है? क्या ऐसा आयोजन व्यवसाय या राजनीति नहीं है? ऐसे में युवा पीढ़ी कितना विकास कर पाएगी?
·         हथेली पर खैनी और जुबान पर गालियाँ: क्या यही हमारी सभ्यता या संस्कृति है? क्या बच्चों और युवाओं को इसी रूप में देखना चाहते हैं?
·         क्या गाँव के मुख्य मार्ग पर कूड़ा फेंकना हमारे सभ्य और विकसित समाज का परिचायक है?
·         ढलाईनुमा निर्मित रास्तों में जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं औए जल-जमाव की स्थिति आ गई है. क्या यही विकास है?
·         क्या आए दिन छोटे-बड़े आयोजनों में तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाना विकसित समाज का परिचायक है?

‘राजनीति’, ‘नेतृत्व’ और ‘विकास’ ऐसे शब्द हैं जो समाज की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं. आज की राजनीति शराब की बोतलें, वोट की कीमतें, घरवाद, जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, गठबंधन और महागठबंधन तय करती हैं और इसके लिए हम सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं.
पंचायत चुनाव की मूल भावना ग्राम में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विकास में भागीदारी है. लेकिन क्या ऐसा होता रहा है या हो रहा है? अगर नहीं, तो उठें, जागें, अपने को जानें, अपनों को पहचानें, अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जानें, अपनी असीम और बहुमूल्य ताकत को पहचानें और वर्तमान राजनीति/नेतृत्व में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें. ऐसे व्यक्ति का चयन/समर्थन करें जिसकी ईमानदार आंदोलनात्मक विचार हम सबकी दशा और दिशा में सुधार ला सके. गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार, अन्धविश्वास, जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, घरवाद, और सामंती सोच से मुक्त स्वस्थ और गम्भीर राजनीति की ओर कदम बढ़ा सके. आइए गम्भीर, स्वस्थ और सकारात्मक राजनीति की शुरुआत करें:    
वेतनरहित राजनैतिक पदों के भावी उम्मीदवारों के बारे में क्या आप निम्नलिखित बातें जानते हैं:
Ø  उनकी पहचान क्या है?
Ø  वर्तमान में जीविकोपार्जन के लिए क्या करते हैं? ऐसा कोई व्यक्ति जो स्वयं के जीविकोपार्जन के लिए कुछ नहीं करता या करने का प्रयास नहीं करता वह समाज (दूसरों) के लिए क्या और कहाँ से करेगा? क्या ऐसों के लिए पद ही जीविकोपार्जन का साधन नहीं होगा?
Ø  आपके साथ मिलकर या रहकर समाज सेवा (धर्म, खेल-कूद और सांस्कृतिक विकास) की आड़ में आपके व्यक्तित्व, समाज और गाँव को दीमक की तरह नहीं चाट रहे हैं?
Ø  क्या आपके व्यक्तिगत झगड़ों में रुचि लेते हैं? या थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी में स्थापित करते हैं?
Ø  जो पूर्व में जन-प्रतिनिधि रह चुके हैं आपके अधिकारों की कितनी रक्षा कर पाए हैं? आप उनसे कितने संतुष्ट रहे हैं?
Ø  राजनैतिक साथी जो चुनाव के पहले शराब पिलाता है या मुर्गा खिलाता है या भोज देता है या पैसे देता है या प्रलोभन देता है, चुनाव के बाद भी क्या ऐसा करता है?
क्या आप ऐसा मानते हैं कि अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव में जीत या हार हम सब की होती है? सिर्फ नेता की नहीं?
क्या आप ऐसा मानते हैं कि अभी तक हम सब हारते ही रहे हैं?
अतः उपरोक्त दशाओं में आप सभी से सादर अपील है कि जो भी व्यक्ति खुद को उपरोक्त से परे मानते हों, राजनीति में आगे आएँ.

---प्रेमचंद्र ओझा 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें