रविवार, 17 अप्रैल 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए  
संपादन: डॉ. सुमीता                                                        नवांक 2, मार्च 2016
संवाद:
मार्च यानी फागुन का महीना. मार्च यानी वसंत के शबाब पर होने के दिन. मार्च यानी वर्ष के सबसे खुशनुमा दिन, प्रकृति के सँवरने के दिन, पेड़ों के नए पैहरन के दिन, सब किसिम के रंगों के दिन, फसलों के दिन, खुशियों के दिन, उत्सवों के दिन... हिंदु कैलेण्डर के मुताबिक खुशियों और रंगों से सराबोर होते हुए फाग के साज के साथ वर्षांत के दिन. हमारे देश में वित्तीय वर्ष का अंत भी मार्च में ही होता है.
मार्च ( 8 मार्च) अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए भी खास है. सहज प्रश्न उठता है कि क्या बाकी दिन महिलाओं के नहीं हैं? सच है कि मानव समाज में आदर्श स्थिति तो यही है कि ऐसे दिवस मनाने की जरूरत ही न हो. यह भी सच है कि महिलाओं के लिए बेहतर हुआ है समाज लेकिन यह भी सच है कि घर-परिवार के भीतर और बाहर स्त्रियों की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा खतरे से बाहर नहीं है. लिंग के आधार पर भेद-भाव जारी है. अशिक्षा, गैर-जागरूकता, आर्थिक परतंत्रता जैसी बेड़ियों को काट जैसे-जैसे स्त्री आगे बढ़ रही है, उसके दमन और शोषण के ज्यादा बारीक और शालीन औजार इजाद कर लिए जाते हैं. इन सभी नकारात्मक स्थितियों से पार पाने की जागरूकता स्त्रियों में आ सके, इस कोशिश के नाम महिला दिवस मनाने की परम्परा जारी रखना जरूरी है फिलहाल.
मानव समाज स्वस्थ और आनंदित तभी रह सकता है जब स्त्री और पुरुष के बीच अपनी-अपनी विशिष्टताओं को अक्षुण्ण रखते हुए भी बराबरी के स्तर पर सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व कायम रहे. बेहतरी-कमतरी की अहमन्यक जमीन पर पुरुष और स्त्री के बीच परम्परागत तौर पर चले आ रहे शोषक-शासित, बुर्जुआ-सर्वहारा जैसे सम्बन्ध समानता के सम पर सहजीवा और सहभोक्ता हो सके इसकी सत्कामना और सत्प्रयास के साथ यह अंक स्त्री स्वर को समर्पित है. साथ ही शान्ति-सद्भावना और हँसी-खुशी के रंगों से सराबोर होली के त्योहार के लिए आप सभी को शुभकामानाएँ.
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स्त्री-सुबोधिनी*
--- सुमीता
तू उनकी बेचैन भूख के क्रोध में फट जाने के डर के बदले
अपनी भूख के मर जाने से डर .

तेरी आत्मा को चींथते उनके बेपर्दा शब्दों की
नंगई से शर्मसार न हो
अपनी आत्मा पर पड़ने वाले उस बोझ से डर
जो धीरे-धीरे तुझे नैतिक गुलामी की
राह पर धकिया देने वाले हो .

पानी सम्भाले ही रखने की
जबरी जवाबदेही और अँगुलियाँ उठ जाने के
वितण्डावाद के बदले उसी पानी से पहले खाल फिर माँस-अस्थि-मज्जा के खा लिए जाने से डर .

रोज ही फचीटते उनके कपड़े
गर्द और गुबार के साथ-साथ
अपनी चटख खुशरंग हँसी और चैनोसुकून के
बदरंग हो जाने से डर .

उनकी नींदों में खलल पड़ जाने की शंका में
सहम-सहम कर साँसें लेने के बदले
तिल-तिल चौंक कर जागने और
अपनी नींदों के उड़ जाने से डर .

प्रताड़ना के अनगिनत तेज़ाबी उपक्रमों या
उनकी अदालतों के बेहिसाब प्रपंचों में
पिस जाने के डर के बदले
तू अपनी चेतना के सभी सुनहरे हर्फों और उजले सपनों की आत्महन्ता होने से डर .

उनकी घनघोर लिप्सा की प्रतिक्रिया में
निष्ठुर निरपेक्ष हो पलायन कर जाने या उनसा ही
हो जाने की साजिश का शिकार हो जाने से डर .

तू जीने से नहीं
रोज-ब-रोज मर जाने से डर.
[* मन्नू भंडारी जी की एक कहानी का शीर्षक]

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जरा सोचिए ...
भाषा में भदेस होना
पुरुषों द्वारा आम बोलचाल में, मजाक में, बेध्यानी में, क्रोध में या हिकारत में उच्चारित गाली-गलौज के शब्दों पर जरा ध्यान दें. स्पष्ट हो जाएगा कि औरत जात से कितनी घृणा करते हैं वे. (औरतों की इज्जत करने का दम भरने वाले अपनी भाषा पर गौर फरमाएँ.) सभ्यता के विकास-क्रम में सत्ता-शक्ति-पूँजी पर एकाधिकार जमाते पुरुष के लिए खुद से इतर सबकुछ उसके साम्राज्य का हिस्सा था जिसमें सबसे महत्वपूर्ण थी स्त्री. लाजिमी है कि जिसपर शासन करना हो उसे बराबरी का दर्जा भला कैसे दिया जा सकता है? सो उसे दोयम दर्जे का, हीन और हेय बनाए रखने के किए अपमान-प्रताड़ना-घृणा का हथियार सबसे मुफीद था. और इसका शाब्दिक अभ्यास बनी गालियाँ. ऐसी प्रताड़नाओं से खोखली हो चुकी स्त्री अगली पीढ़ी को भाषा में गालियों की कुरूपता से बचा पाने में कभी सफल नहीं हो सकी. प्रख्यात लेखिका जर्मेन ग्रीयर के शब्दों में देह घृणा जितनी विकसित होती है, लैंगिक कर्म को त्यागने में असमर्थ रहने वाले उससे उतना ही डरते हैं और घृणा करते हैं; उसी अनुपात में भाषा में गालियाँ बढ़ती हैं.
दिलचस्प तो यह है कि एक ओर नारी-महिमा और उनके सौन्दर्य के स्तुति-गान की गाथाओं से साहित्य और इतिहास पटा पड़ा है लेकिन वास्तव में यह ऐसा ही है जैसे घूंघटों, नकाबों, कपड़ों और प्रसाधनों के अनेक तहों में छुपाई गई स्त्री-देह पुरुषों के हरेक वाक्य में लगातार बेदर्दी से उघाड़ी जाती है. भाषा के भद्देपन से कदरूप हुई स्त्री प्रतिक्रिया में जब बोलचाल की पुरुषों जैसी भंगिमा अख्तियार करती है तो और भी दयनीय हो जाती है. सबसे खतरनाक तो यही है कि स्त्रियाँ खुद भी अपने अस्तित्व, अपनी देह से उसी तरह घृणा करती हैं जैसे कि पुरुष. नहीं तो ऐसा कैसे होता कि मानव समाज में माँ-बहन की गालियाँ यूँ सहज स्वीकृत हो जातीं?
स्वस्थ समाज के लिए पुरुष और स्त्री दोनों की प्रेमपूर्ण बराबर भागीदारी और बराबर योगदान अपरिहार्य है जिसके लिए घृणा-कटुता-गैरबराबरी की हरेक बाधा खत्म कर डालने के सिवा कोई और विकल्प है ही नहीं. तो पुरुषो, आप कबतक असभ्य, बर्बर और अमानुष बने रहेंगे? स्त्रियो, अपने अस्तित्व के आत्मसम्मान के प्रति कबतक बेहोश रहेंगी आप?

चिड़िया
               --- लीना मल्होत्रा

महत्वाकांक्षाओं की चिड़िया
औरत की मुंडेर पर आ बैठी है
शिकारी ने
दम साध
तान ली है बन्दूक
अब अगर निशाना चूक गया
तो औरत मरेगी.
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समानार्थी
               --- बाबुषा कोहली
पहले सात फेरे 
तुम उपसर्ग की तरह रहना
दूसरे सात फेरे प्रत्यय-सा चलना
किसी समानार्थी शब्द की तरह जीवन भर रहना.
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हमारी कामना है कि खुशियों और आनंद की शतरंगी बौछारों से सराबोर होली हम सभी के लिए शुभकामनाओं की सौगात लेकर आए. होली सुरक्षित हो इसके लिए रासायनिक रंगों के स्थान पर हम प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करें. जैसे हल्दी घोलकर पीला, चुकंदर के रस से लाल रंग; बेसन, हल्दी और चन्दन पाउडर मिलाकर पीला, मेहंदी पाउडर से हरा, उड़हुल और टेसू (पलाश) के फूलों की सूखी पंखुड़ियाँ पीसकर लाल गुलाल बना कर उपयोग करें. इससे हम कई त्वचा रोगों और अन्य समस्याओं से भी बच सकेंगे. बाजार की मिठाइयों के बदले हम घर में बनी मिठाइयाँ खाएँ-खिलाएँ. एक होली गीत के साथ आप सभी को खुशरंग और सुरक्षित होली मुबारक ...
होली गीत
आई होली, भाई होली, छाई होली, रंग लाई होली
आई, भाई, छाई रंग लाई होली हो ...
पिचकारी खरीदा हमने हो, गुलाल बनाया हमने हो,
रंग डाला हमने हो, सबको सताया हमने हो,
आई होली ...
गुझिया बनाया हमने हो, सबको बाँटा हमने हो,
थोड़ा बचाया हमने हो, उसको खाया हमने हो,
आई होली ...

--- सर्जना ओझा (कक्षा 5)

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए; नव अंक: 1

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए
संपादन: डॉ. सुमीता                          वर्ष: 30+1, नव अंक: 1, वसंतपंचमी 2016
संवा:


महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की इन पंक्तियों से ज्ञान, विद्या और कला की देवी की प्रार्थना करते हुए हम नव वसंत का स्वागत करते हैं:
काट अन्ध-उर के बन्धन स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद तम-हर प्रकाश भर
             जगमग जग कर दे !
वर दे, वीणावादिनी वर दे.
[हे माँ! तू ज्ञान की रोशन नदी बहा दे कि अज्ञान और जड़ता की जाने कितनी परतों से जकड़े हमारे हृदय का अन्धकार कट सके. ईर्ष्या, द्वेष, कटुता के सभी कलुष पोंछ दे माँ कि हमारी दुनिया प्रेम-सौहार्द और शान्ति के प्रकाश से जगमगा उठे. हे वीणावादिनी माता सरस्वती! आप हमें आशीर्वाद दें कि हमारी चेतना में विद्या, बुद्धि और विवेक की लौ जलती रहे अहर्निश.]
विशेष है वसंत. ऋतुराज है. ऋत है. जीवन और मरण का अद्भुत संधिकाल है वसंत. जब धरती और हवा में वसंती रंग घुल जाए, तब हमारे दिलों के भी सभी सुगन्धित फूल खिल जाएँ कि हमारा संसार आनन्द और शान्ति के राग से गुंजरित हो जाए. इसी सत्कामना के साथ बड़े हर्ष से हम ‘समाधान’ आप से साझा कर रहे हैं.

विशिष्ट है ‘समाधान’. सन् 1985 से साहित्य, संस्कृति और वैचारिकी की धरोहर की जमीन पर नवोन्मेष का आह्वान है 'समाधान'. मानवता और बन्धुत्व पक्ष है इसका. शिव और शुभ की कामना के साथ विभिन्न विषयों और रूपाकारों में आपके बीच उपस्थित होता रहेगा.
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बचा रहेगा
धरी रह जाएँगी सारी की सारी
घृणाएँ, कटुताएँ
जलकर राख हो जाएगी
रस्सी की तरह ऐंठी हुई
सारी की सारी
ईर्ष्याएँ, अहंमन्यताएँ

बचा रहेगा
सिर्फ एक
प्यार के लिए पछाड़ें खाता
उठता, गिरता स्मृतियों का समुद्र. 
                       --- भगवत रावत

अग्निबीज
शहर-शहर सुलगे हैं अलाव
गाँव-गाँव कउड़े जले हैं
इस तरह फैली है आग
हर जगह अग्निबीज मनचले हैं.
                        ---डॉ. अनुपम

मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली पिछले सप्ताह इस असार संसार को अलविदा कह गए. उनके इन शे'रों से उन्हें समाधान समूह की श्रद्धांजलि समर्पित है:

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है
आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
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जरा सोचिए...  
हमारी उत्सवधर्मिता
अजब के उत्साही हम और गजब की हमारी उत्सवधर्मिता ! धर्म का अर्थ भले न जाने लेकिन धार्मिकता के गुमान में फूले न समाते ! धर्म प्रतिस्थापना का जुआ पीढ़ी-दर- पीढ़ी रिले रेस सा आगे बढ़ाते महान कार्य कर सकने के परम संतुष्टि भाव से गर्वोन्नत उन्मत्त हैं हम. फिर उत्सव के लिए कारण की दरकार ? इस प्रश्न की गुंजाइश ही कहाँ है ? अब तैंतीस करोड़ तो प्राचीन देवी देवता ठहरे, अर्वाचीन जाने कितने ?! जबकि साल में दिन केवल तीन सौ पैंसठ. बाकी शादी-विवाह आदि सोलह संस्कार, जन्मतिथि-पुण्यतिथि आदि हैं ही साथ में आस्था के प्रमाणन कार्यालय जैसे तमाम पूजास्थलों में दैनिक अर्ध्य-उत्सव की बहार. और हरेक उत्सव का पर्याय बन चुका है लाउडस्पीकर, डीजे, चीख-पुकार, चिल्ल-पों, शोर-शराबा... .  किसी की जान जाती हो तो जाए, हमारी बला से ! इस मामले में शहर से भी बदतर हालत है गाँवों की. सम्पन्न हुए हैं गाँव. बेहतर हुई है निम्न और निम्नतम आयवर्ग की माली हालत और इसी अनुपात में बढ़ी है खर्चने और प्रदर्शन करने की होड़. हालाँकि, आयवर्ग चाहे कोई भी हो, मानसिक दरिद्रता के मामले में अधिकांशतः कोई भेद नहीं है. किसी भी उत्सव में केवल पचास मीटर रेडियस के क्षेत्र में कम-से-कम पाँच जोड़े लाउडस्पीकर दिक्-दिगन्त में घमासान मचाते दीख जाना आम दृश्य है. सिर पर हथौड़े बजाते, कान फोड़ते डीजे व्यवसाय उत्तरोत्तर उत्कर्ष पर है.
किस कदर हिंसक हैं हम ?! और अत्याचारी ?! हम नवजात शिशुओं को भी नहीं बख्शते. जैसे साँप अपने अण्डे खा जाता है कुछ उसी की तरह हमारा भी आचरण है. बच्चे के जन्म की खुशी उसे चौबीस में से बीस घण्टे के औसत से कई दिनों तक लाउडस्पीकर पर सोहर सुनाकर मनाई जाती है यहाँ. बदले में बच्चे को मिलता है: कम उम्र में बहरापन, उच्च रक्तचाप, दिमाग का अविकसित रह जाना, कई अन्य शारीरिक और मानसिक बीमारियों के साथ दिमाग का कैन्सर जाने की सम्भावना. लगातार तेज आवाज का असर बच्चे, वयस्क, बूढ़े यानी सभी में एक जैसा ही होता है. डीजे के शोर से पड़ोसी दुबौली गाँव में सत्तर बर्षीय बुजुर्ग की मौत की खबर 17 फरवरी, 2016 के दैनिक जागरण (पृष्ठ 7) में छपी है. भूस्खलन और भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी ध्वनि-विस्फोट जिम्मेदार होते हैं. 
एक ओर मनुष्यता पृथ्वी और पर्यावरण बचा सकने की जद्दोजहद कर रही है, वहीं हम अहं-प्रदर्शन में प्रतियोगिता करते ध्वनि-प्रदूषण को खतरनाक स्तर तक बढ़ाए चले जा रहे हैं. स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि सरकार को भी कानून के चाबुक (अबतक असभ्य जानवर ही हैं हम) की जरूरत पड़ रही है. हाल ही में बिहार सरकार ने ध्वनि की उच्चतम सीमा और शोर करने की समय सीमा संबंधी कानून पारित कर सख्ती से लागू करने का फैसला किया है. इसके अनुसार रात दस बजे से सुबह छः बजे के बीच लाउडस्पीकर बजाना अपराध माना जाएगा. इसका उल्लंघन करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी. ध्वनि की उच्चतम सीमा मापी मानक यंत्रों से लैस सम्बन्धित महकमे की व्यवस्था सुचारु की जा रही है.
हम कैसे कमदिमागों का हुजूम हैं कि इक्कीसवी शताब्दी में पहुँचकर भी इतने ही सभ्य हो पाएँ हैं कि अक्लमंदी की किसी भी बात को फूहड़ हास्य में उड़ा देने  में अपनी शान समझते हैं. हम संगीत और शोर का फर्क नहीं जानते. हम आनन्द और उच्चश्रृंखल उन्मत्तता में फर्क नहीं जानते. खुशी और पूजा-अर्चना के नाम पर अपनी चिल्लाहट की लाठी से सबको पीट डालने का धृष्ट, भ्रष्ट और अश्लील आचरण हम कबतक दुहराए जाएँगे? क्या इस विषय पर आत्म-मन्थन कर सकने की बुद्धि नहीं हुई है हममें?


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सन् 1985 से समाधान सांस्कृतिक समूह के लिए डॉ. अनुपम द्वारा प्रकाशित.