समाधान
कलम, कला,
संवाद के लिए
संपादन: डॉ. सुमीता नवांक
2, मार्च 2016
मार्च
यानी फागुन का महीना. मार्च यानी वसंत के शबाब पर होने के दिन. मार्च यानी वर्ष के
सबसे खुशनुमा दिन, प्रकृति के सँवरने के दिन,
पेड़ों के नए पैहरन के दिन, सब किसिम के रंगों के दिन, फसलों
के दिन, खुशियों के दिन,
उत्सवों के दिन... हिंदु कैलेण्डर के मुताबिक खुशियों और
रंगों से सराबोर होते हुए फाग के साज के साथ वर्षांत के दिन. हमारे देश में
वित्तीय वर्ष का अंत भी मार्च में ही होता है.
मार्च ( 8 मार्च) अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए भी खास
है. सहज प्रश्न उठता है कि क्या बाकी दिन महिलाओं के नहीं हैं? सच है
कि मानव समाज में आदर्श स्थिति तो यही है कि ऐसे दिवस मनाने की जरूरत ही न हो. यह
भी सच है कि महिलाओं के लिए बेहतर हुआ है समाज लेकिन यह भी सच है कि घर-परिवार के
भीतर और बाहर स्त्रियों की शारीरिक,
मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा खतरे से बाहर नहीं है. लिंग के
आधार पर भेद-भाव जारी है. अशिक्षा,
गैर-जागरूकता,
आर्थिक परतंत्रता जैसी बेड़ियों को काट जैसे-जैसे स्त्री आगे
बढ़ रही है, उसके दमन और शोषण के ज्यादा बारीक और शालीन औजार इजाद कर लिए जाते हैं. इन सभी
नकारात्मक स्थितियों से पार पाने की जागरूकता स्त्रियों में आ सके, इस
कोशिश के नाम महिला दिवस मनाने की परम्परा जारी रखना जरूरी है फिलहाल.
मानव
समाज स्वस्थ और आनंदित तभी रह सकता है जब स्त्री और पुरुष के बीच अपनी-अपनी
विशिष्टताओं को अक्षुण्ण रखते हुए भी बराबरी के स्तर पर सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व
कायम रहे. बेहतरी-कमतरी की अहमन्यक जमीन पर पुरुष और स्त्री के बीच परम्परागत तौर
पर चले आ रहे शोषक-शासित, बुर्जुआ-सर्वहारा जैसे सम्बन्ध समानता के सम पर सहजीवा
और सहभोक्ता हो सके इसकी सत्कामना और सत्प्रयास के साथ यह अंक स्त्री स्वर को
समर्पित है. साथ ही शान्ति-सद्भावना और हँसी-खुशी के रंगों से सराबोर होली के
त्योहार के लिए आप सभी को शुभकामानाएँ.
*****
स्त्री-सुबोधिनी*
--- सुमीता
तू उनकी बेचैन भूख के क्रोध में फट जाने के डर के बदले
अपनी भूख के मर जाने से डर .
तेरी आत्मा को चींथते उनके बेपर्दा शब्दों की
नंगई से शर्मसार न हो
अपनी आत्मा पर पड़ने वाले उस बोझ से डर
जो धीरे-धीरे तुझे नैतिक गुलामी की
राह पर धकिया देने वाले हो .
पानी सम्भाले ही रखने की
जबरी जवाबदेही और अँगुलियाँ उठ जाने के
वितण्डावाद के बदले उसी पानी से पहले खाल फिर माँस-अस्थि-मज्जा
के खा लिए जाने से डर .
रोज ही फचीटते उनके कपड़े
गर्द और गुबार के साथ-साथ
अपनी चटख खुशरंग हँसी और चैनोसुकून के
बदरंग हो जाने से डर .
उनकी नींदों में खलल पड़ जाने की शंका में
सहम-सहम कर साँसें लेने के बदले
तिल-तिल चौंक कर जागने और
अपनी नींदों के उड़ जाने से डर .
प्रताड़ना के अनगिनत तेज़ाबी उपक्रमों या
उनकी अदालतों के बेहिसाब प्रपंचों में
पिस जाने के डर के बदले
तू अपनी चेतना के सभी सुनहरे हर्फों और उजले सपनों की आत्महन्ता
होने से डर .
उनकी घनघोर लिप्सा की प्रतिक्रिया में
निष्ठुर निरपेक्ष हो पलायन कर जाने या उनसा
ही
हो जाने की साजिश का शिकार हो जाने से डर .
तू जीने से नहीं
रोज-ब-रोज मर जाने से डर.
[* मन्नू भंडारी जी की एक कहानी का शीर्षक]
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जरा सोचिए ...
भाषा में भदेस होना
पुरुषों द्वारा आम बोलचाल में, मजाक में, बेध्यानी में, क्रोध में या हिकारत में
उच्चारित गाली-गलौज के शब्दों पर जरा ध्यान दें. स्पष्ट हो जाएगा कि औरत जात से
कितनी घृणा करते हैं वे. (औरतों की इज्जत करने का दम भरने वाले अपनी भाषा पर गौर फरमाएँ.)
सभ्यता के विकास-क्रम में सत्ता-शक्ति-पूँजी पर एकाधिकार जमाते पुरुष के लिए खुद
से इतर सबकुछ उसके साम्राज्य का हिस्सा था जिसमें सबसे महत्वपूर्ण थी स्त्री.
लाजिमी है कि जिसपर शासन करना हो उसे बराबरी का दर्जा भला कैसे दिया जा सकता है? सो उसे दोयम दर्जे का, हीन और हेय बनाए रखने के
किए अपमान-प्रताड़ना-घृणा का हथियार सबसे मुफीद था. और इसका शाब्दिक अभ्यास बनी
गालियाँ. ऐसी प्रताड़नाओं से खोखली हो चुकी स्त्री अगली पीढ़ी को भाषा में गालियों
की कुरूपता से बचा पाने में कभी सफल नहीं हो सकी. प्रख्यात लेखिका जर्मेन ग्रीयर
के शब्दों में “देह घृणा जितनी विकसित होती है, लैंगिक कर्म को त्यागने में असमर्थ रहने वाले उससे उतना ही डरते हैं और घृणा
करते हैं; उसी अनुपात में भाषा में गालियाँ बढ़ती हैं.”
दिलचस्प तो यह है कि एक ओर नारी-महिमा और उनके
सौन्दर्य के स्तुति-गान की गाथाओं से साहित्य और इतिहास पटा पड़ा है लेकिन वास्तव
में यह ऐसा ही है जैसे घूंघटों, नकाबों, कपड़ों और प्रसाधनों के अनेक तहों में छुपाई गई स्त्री-देह पुरुषों के हरेक
वाक्य में लगातार बेदर्दी से उघाड़ी जाती है. भाषा के भद्देपन से कदरूप हुई स्त्री
प्रतिक्रिया में जब बोलचाल की पुरुषों जैसी भंगिमा अख्तियार करती है तो और भी
दयनीय हो जाती है. सबसे खतरनाक तो यही है कि स्त्रियाँ खुद भी अपने अस्तित्व, अपनी देह से उसी तरह घृणा
करती हैं जैसे कि पुरुष. नहीं तो ऐसा कैसे होता कि मानव समाज में माँ-बहन की
गालियाँ यूँ सहज स्वीकृत हो जातीं?
स्वस्थ समाज के लिए पुरुष और स्त्री दोनों की
प्रेमपूर्ण बराबर भागीदारी और बराबर योगदान अपरिहार्य है जिसके लिए घृणा-कटुता-गैरबराबरी
की हरेक बाधा खत्म कर डालने के सिवा कोई और विकल्प है ही नहीं. तो पुरुषो, आप कबतक असभ्य, बर्बर और अमानुष बने
रहेंगे? स्त्रियो, अपने अस्तित्व के आत्मसम्मान के प्रति कबतक बेहोश रहेंगी आप?
चिड़िया
--- लीना मल्होत्रा
महत्वाकांक्षाओं की
चिड़िया
औरत की मुंडेर पर आ बैठी
है
शिकारी ने
दम साध
तान ली है बन्दूक
अब अगर निशाना चूक गया
तो औरत मरेगी.
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समानार्थी
--- बाबुषा कोहली
पहले सात फेरे
तुम उपसर्ग की तरह रहना
दूसरे सात फेरे प्रत्यय-सा चलना
किसी समानार्थी शब्द की तरह जीवन भर रहना.
तुम उपसर्ग की तरह रहना
दूसरे सात फेरे प्रत्यय-सा चलना
किसी समानार्थी शब्द की तरह जीवन भर रहना.
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हमारी
कामना है कि खुशियों और आनंद की शतरंगी बौछारों से सराबोर होली हम सभी के लिए
शुभकामनाओं की सौगात लेकर आए. होली सुरक्षित हो इसके लिए रासायनिक रंगों के स्थान
पर हम प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करें. जैसे हल्दी घोलकर पीला, चुकंदर के रस से
लाल रंग; बेसन, हल्दी और चन्दन पाउडर मिलाकर पीला, मेहंदी पाउडर से हरा, उड़हुल और
टेसू (पलाश) के फूलों की सूखी पंखुड़ियाँ पीसकर लाल गुलाल बना कर उपयोग करें. इससे
हम कई त्वचा रोगों और अन्य समस्याओं से भी बच सकेंगे. बाजार की मिठाइयों के बदले
हम घर में बनी मिठाइयाँ खाएँ-खिलाएँ. एक होली गीत के साथ आप सभी को खुशरंग और
सुरक्षित होली मुबारक ...
होली गीत
आई होली,
भाई होली,
छाई होली,
रंग लाई होली
आई,
भाई,
छाई रंग लाई होली हो ...
पिचकारी खरीदा हमने हो, गुलाल बनाया हमने हो,
रंग डाला हमने हो,
सबको सताया हमने हो,
आई होली ...
गुझिया बनाया हमने हो,
सबको बाँटा हमने हो,
थोड़ा बचाया हमने हो,
उसको खाया हमने हो,
आई होली ...
--- सर्जना ओझा (कक्षा 5)