गुरुवार, 14 जुलाई 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए  
संपादन: डॉ. सुमीता                    सन् 1985 से प्रकाशित      नवांक 4, मई 2016


संवाद:
महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में गुरू-वंदना से पहले दुष्ट-वंदना की है: ‘बंदऊ प्रथम दुष्ट के चरणा...’ दुष्टों की पहचान बताते हुए उनके शब्द हैं: ‘परहित घृत जिनके मान माँखी ...’ यानी जिस तरह मक्खी अपनी जान देकर भी घी में गिरकर घी खराब कर देती है वैसे ही दुष्ट जन दूसरों का नुकसान करने में अपनी जान तक गवां देने को तत्पर रहते हैं. 

दुष्टता की पहचान बहुधा आसान नहीं होती. लोभ, मोह, क्रोध या अहंकार जैसे नकारात्मक भावों की तरह मानव मस्तिष्क में उत्पन्न हो जाने वाला कोई अस्थाई भाव नहीं है यह. किन्हीं विशेष मानसिक बुनावट का परिणाम है दुष्टता जिससे प्रभावित व्यक्ति द्वारा संपन्न अधिकतर कार्यों का परिणाम केवल नुकसान और नकारात्मकता ही होती है. कई बार ऐसा भी होता है कि आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया के आधार पर एक ही स्तर पर खड़े दीखते दो पक्षों में दुष्टता की ओर कौन-सा पक्ष है यह तय कर पाना काफी कठिन होता है. ऐसी स्थितियों में सत्य और शुभ के पक्ष को चुन पाना विवेकसम्मत धीरज की माँग करता है.

दुष्ट कौन? जो स्वार्थ और लालचवश धोखे से दूसरे की संपत्ति-सुख-शान्ति-समृद्धि हड़पने की कोशिश करे, जो अपने सम्पर्क में आनेवाले व्यक्तियों, खासकर अपने से छोटों व बच्चों को जानबूझकर गलत रास्ते पर प्रेरित करे, जो उन्हें सदाचरण और सद्विचार से भटकाए, जो उनका शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक शोषण कर आनंदित हो... और यह सब करते हुए सहज मनोरंजन या उत्फुल्ल आनंद का हवाला देकर स्वयं को न्यायोचित ठहराए, खुद पर दबाव महसूस होने पर खुद के बजाए पीड़ित को दोषी साबित कर देने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दे...

स्वस्थ समाज के नासूर ऐसे दुष्ट हमारे आसपास कहीं भी मौजूद हो सकते हैं. समाज की बेहतरी के लिए दुष्टता का शमन जरूरी है. जरूरी है कि हमारा पक्ष स्पष्ट हो और बेहद जरूरी है कि हम सजग और चौकस रहें- बाहर भी और अपने भीतर भी.                  
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परागण

तितली के होंठों में दबे हैं
दुनिया के सबसे सुन्दर प्रेम-पत्र

तितली एक उड़ता हुआ फूल है

हँसी किसी फूल की
उड़कर जाती है
एक उदास फूल के पास

उड़कर जाता है मन एक फूल का
उतरती है इच्छा किसी फूल में

एक फूल का स्वप्न
किसी फूल के स्वप्न में मिलता है

दो फूलों के बीच का समय
कल्पना है एक नए संसार की

तितली की तरह
सिरजने की उद्दात्तता भी होना चाहिए
एक संवदिया में

--- हेमन्त देवलेकर
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सवेरा फिर नहीं होता

सवेरा फिर नहीं होता

छींके से दूध पीकर गई बिल्ली
आश्वस्त है
उसका दबा-छिपा अन्दाज
निकलता है घरों से
बाहर ईश्वर का काहिलपन सूंघता है
इन्सानों की नंगी और बेमुरौवत सोच
जो कि पत्थरों को दी गई
हमारी जबान है
जबकि पत्थरों को चुना था
नदियों ने, पहाड़ों ने
अपने भरोसे के लिए. 

--- नीलोत्पल
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पक्षधर

इन्सान है कि जनमता है
और विरोध के वातावरण में आ गिरता है:
उसकी पहली साँस संघर्ष का पैंतरा है
उसकी पहली चीख एक युद्ध का नारा है
जिसे वह जीवन भर लड़ेगा.

हमारा जन्म लेना ही पक्षधर बनना है,
जीना ही क्रमशः यह जानना है
कि युद्ध ठनना है
और अपनी पक्षधरता में
हमें पग-पग पर पहचानना है
कि अब से हमें हर क्षण में, हर वार में, हर क्षति में,
हर दुःख-दर्द, जय-पराजय, गति-प्रतिगति में
स्वयं अपनी नियति बन
अपने को जनना है.

ईश्वर
एक बार का कल्पक
और सनातन क्रान्ता है:
माँ- एक बार की जननी
और आजीवन ममता है:
पर उनकी कल्पना, कृपा और करुणा से
हम में यह क्षमता है
कि अपनी व्यथा और अपने संघर्ष में
अपने को अनुक्षण जनते चलें,
अनुक्षण अपने को परिक्रान्त करते हुए
अपनी नई नियति बनते चलें.

पक्षधर और चिरन्तन,
हमें लड़ना है निरन्तर,
आमरण अविराम –
पर सर्वदा जीवन के लिए:
अपनी हर साँस के साथ
पनपते इस विश्वास के साथ
कि हर दूसरे की हर साँस को
हम दिला सकेंगे और अधिक सहजता,
अनाकुल उन्मुक्ति, और गहरा उल्लास

अपनी पहली साँस और चीख के साथ
हम जिस जीवन के
पक्षधर बने अनजाने ही
आज होकर सयाने
उसे हम वरते हैं:
उसके पक्षधर हैं हम
इतने घने
कि उसी जीने और जिलाने के लिए
स्वेच्छा से मरते हैं!

  ---अज्ञेय
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जरा सोचिए ...
अफवाह गर्म है ...

बातों से बातें निकलती हैं और दूर तलक चलती जाती हैं. इस चलते जाने में बातों का रूप-रंग बदलता जाना सबसे स्वभाविक होता है. उदाहरण के लिए छः व्यक्तियों के बीच बातचीत का एक नमूना देखिए: जग्गू ने मोहन से कहा, मेरे पास एक अच्छा भूरा कुत्ता है. मोहन ने अनीता से कहा, जग्गू के पास एक भूरा कुत्ता है. अनीता ने रफीक से कहा, जग्गू के पास एक गन्दा भूरा कुत्ता है. रफीक ने श्याम से कहा, जग्गू के पास एक गन्दा कुत्ता है. श्याम ने नफीसा से कहा, जग्गू के पास एक सड़ा कुत्ता है. नफीसा ने जग्गू से कहा, लोग कहते हैं कि तुम सड़े कुत्ते हो. जग्गू बेचारा! चारों खाने चित्त...

सामान्यतः सत्य और तथ्य से परे जो भी बेबुनियाद बातें लोगों के बीच आम हो जाती हैं, वे ही अफवाह कहलाती हैं. चूंकि झूठ/अफवाह के पाँव नहीं, पंख होते हैं; इसलिए यह कितनी तेजी से फैलता हैं, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है. हम एक कोशिश करके देखते हैं: मान लेते हैं कि एक व्यक्ति को कोई खबर मिली और पंद्रह मिनट में उसने तीन व्यक्तियों को इसे बताया. अगली कड़ी में उन तीन व्यक्तियों ने अगले पंद्रह मिनट में तीन-तीन अन्य लोगों तक उस खबर को बाँटा. यह सिलसिला यूँ ही आगे बढ़ता रहा तो आप जोड़ कर पाएँगे कि ढाई घंटे में 88,573 लोगों तक यह खबर पहुँच चुकी है.


मनुष्य में सुनी-सुनाई बातों पर सहज भरोसा कर लेने की प्रवृति होती है. कोई खबर सच है या झूठ इसकी फिक्र आमतौर पर कोई नहीं करता है. जबकि इस प्रवृति का नाजायज फायदा उठाने वालों की भी कमी नहीं है हमारे समाज में. कई बार ऐसा हुआ है कि स्वार्थलोलुप असामाजिक तत्वों द्वारा सुनियोजित अफवाहों के माध्यम से भीड़ को उकसाकर संगीन अपराध तक करवा लिए गए हैं. सोचने की जरूरत है कि बुद्धि व तर्क की नेमत होने के बावजूद हम सत्य और तथ्य की छानबीन करने के बजाए कम या अधिक नुकसानदायक अफवाहों के फंदे में जब-तब क्यों और कैसे फँस जाते हैं?  

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बुधवार, 11 मई 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए  
संपादन: डॉ. सुमीता                    सन् 1985 से प्रकाशित      नवांक 3, अप्रैल 2016


संवाद:
आजकल हमारे राज्य में पंचायत चुनाव की सरगर्मी जोरों पर है. जहाँ जनता ही शासक हो, राजकाज की ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता और शक्ति संभालने की जिम्मेदारी देश के सभी नागरिकों में समान रूप से बंटी होती है. देश का हरेक वयस्क नागरिक राजकाज में भागीदार बन सके, इसे सुनिश्चित करने के लिए ही हमारे देश में पंचायती राज की व्यवस्था है. यानी नियत चुनावी प्रक्रिया द्वारा पंचायतों में ऐसे प्रतिनिधियों का चयन करना जो पंचायत स्तर पर ग्रामीण समाज को सुव्यवस्थित और विकसित करने का कार्यभार सुरुचि, ईमानदारी और जिम्मेदारीपूर्वक निभा सकें.

इसका सीधा अर्थ यह है कि देश का हर नागरिक इतना जागरुक और समझदार हो कि वह चयन के मामले में सही निर्णय ले सके. वह खुद की और अपने समाज के विकास की दिशा निर्धारित कर सकने के साथ ही अपना यथाशक्ति योगदान कर पाने में भी सक्षम हो सके. आखिर उसका समाज, गाँव, राज्य, राष्ट्र उसी का है और उसे खुद ही इसकी देखभाल करनी है और सर्वांगीण विकास के रास्ते पर इसे आगे बढ़ाना है. लेकिन दुखद वस्तुस्थिति तो यही है कि आज भी हमारी जनता को कुछ स्वार्थी किस्म के सत्तालोलुप व्यक्तियों द्वारा ढोरों-भेड़ों की तरह किसी भी दिशा में हाँक लिया जाता है. इसका कारण जनता की अशिक्षा, गैर-जागरूकता और अपनी शक्ति से अनजान होना ही तो है. प्रसिद्ध कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ के शब्दों में:
(जनता) एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती जाती हवा की जुबान में
हाँ ऽ ऽ हाँ ऽ ऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से डरता है.

अपनी राजनीतिक सहभागिता को हल्के में लेना या भय अथवा लोभवश मताधिकार का दुरुपयोग करना सबसे पहले स्वयं के और उसके बाद नागरिक कर्तव्यों के प्रति किया गया द्रोह ही है जो सर्वथा अनुचित है. हम सभी  सचेत और जिम्मेदार नागरिक बन सकें इस कामना के साथ ...
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इस अंक की विशेष पेशकश है बाबा नागार्जुन की एक कविता और कवि दुष्यंत कुमार का एक मौजूं शेर:
बातें

बातें-
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चन्दन में बसी हुईं
बातें-
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य बंधन में कसी हुईं
बातें-
उसाँस में झुलसीं
रोष के आँच में तली हुईं
बातें-
चुहल में हुलसीं
नेह-साँचे में ढली हुईं
बातें- विष की फुहार-सी
बातें- अमृत की धार-सी
बातें- मौत की काली डोर-सी
बातें- जीवन की दूधिया हिलोर-सी
बातें- अचूक वरदान-सी
बातें- घृणित नाबदान-सी
बातें- फलप्रसू, सुशोभन, फल-सी
बातें- अमंगल विष-गर्भ शूल-सी
बातें-
क्या करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें-
यही अपनी पूँजी, यही अपने औजार
यही अपने साधन, यही अपने हथियार
बातें-
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें-
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, जिक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?    
   *****
“पक गई हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो, ऐसे गुजर होगी नहीं. “

जरा सोचिए ...

क्या हमारा समाज हमारे गुजर-बसर करने अर्थात हमारे जीने के लायक है? यानी क्या यह अपने सदस्यों के व्यक्तित्व और चेतना का पूरा विकास कर पाने में समर्थ है? आइए, अपने परिवेश पर एक नजर डालते हैं:
·         क्या आपने अपने बच्चों को कभी ध्यान से देखा है – मैले-कुचैले फटे कपड़े पहने, हाथ में भोजन के लिए बर्तन लेकर आपस में गाली-गलौज करते हुए स्कूल जाते बच्चे. क्या यही विकसित समाज है? क्या आपने कभी सोचा है कि स्कूल छोड़ने के बाद उन बच्चों की दशा और दिशा क्या होगी?
·         खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के बावजूद इन क्षेत्रों में आपकी कितनी भागीदारी होती है? गाँव में रहते हुए गाँव के लोगों के सहयोग से इन क्षेत्रों कोई कितना आगे निकल पाया है? क्या ऐसा आयोजन व्यवसाय या राजनीति नहीं है? ऐसे में युवा पीढ़ी कितना विकास कर पाएगी?
·         हथेली पर खैनी और जुबान पर गालियाँ: क्या यही हमारी सभ्यता या संस्कृति है? क्या बच्चों और युवाओं को इसी रूप में देखना चाहते हैं?
·         क्या गाँव के मुख्य मार्ग पर कूड़ा फेंकना हमारे सभ्य और विकसित समाज का परिचायक है?
·         ढलाईनुमा निर्मित रास्तों में जगह-जगह गड्ढे हो गए हैं औए जल-जमाव की स्थिति आ गई है. क्या यही विकास है?
·         क्या आए दिन छोटे-बड़े आयोजनों में तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाना विकसित समाज का परिचायक है?

‘राजनीति’, ‘नेतृत्व’ और ‘विकास’ ऐसे शब्द हैं जो समाज की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं. आज की राजनीति शराब की बोतलें, वोट की कीमतें, घरवाद, जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, गठबंधन और महागठबंधन तय करती हैं और इसके लिए हम सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं.
पंचायत चुनाव की मूल भावना ग्राम में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विकास में भागीदारी है. लेकिन क्या ऐसा होता रहा है या हो रहा है? अगर नहीं, तो उठें, जागें, अपने को जानें, अपनों को पहचानें, अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जानें, अपनी असीम और बहुमूल्य ताकत को पहचानें और वर्तमान राजनीति/नेतृत्व में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें. ऐसे व्यक्ति का चयन/समर्थन करें जिसकी ईमानदार आंदोलनात्मक विचार हम सबकी दशा और दिशा में सुधार ला सके. गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार, अन्धविश्वास, जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, घरवाद, और सामंती सोच से मुक्त स्वस्थ और गम्भीर राजनीति की ओर कदम बढ़ा सके. आइए गम्भीर, स्वस्थ और सकारात्मक राजनीति की शुरुआत करें:    
वेतनरहित राजनैतिक पदों के भावी उम्मीदवारों के बारे में क्या आप निम्नलिखित बातें जानते हैं:
Ø  उनकी पहचान क्या है?
Ø  वर्तमान में जीविकोपार्जन के लिए क्या करते हैं? ऐसा कोई व्यक्ति जो स्वयं के जीविकोपार्जन के लिए कुछ नहीं करता या करने का प्रयास नहीं करता वह समाज (दूसरों) के लिए क्या और कहाँ से करेगा? क्या ऐसों के लिए पद ही जीविकोपार्जन का साधन नहीं होगा?
Ø  आपके साथ मिलकर या रहकर समाज सेवा (धर्म, खेल-कूद और सांस्कृतिक विकास) की आड़ में आपके व्यक्तित्व, समाज और गाँव को दीमक की तरह नहीं चाट रहे हैं?
Ø  क्या आपके व्यक्तिगत झगड़ों में रुचि लेते हैं? या थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी में स्थापित करते हैं?
Ø  जो पूर्व में जन-प्रतिनिधि रह चुके हैं आपके अधिकारों की कितनी रक्षा कर पाए हैं? आप उनसे कितने संतुष्ट रहे हैं?
Ø  राजनैतिक साथी जो चुनाव के पहले शराब पिलाता है या मुर्गा खिलाता है या भोज देता है या पैसे देता है या प्रलोभन देता है, चुनाव के बाद भी क्या ऐसा करता है?
क्या आप ऐसा मानते हैं कि अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव में जीत या हार हम सब की होती है? सिर्फ नेता की नहीं?
क्या आप ऐसा मानते हैं कि अभी तक हम सब हारते ही रहे हैं?
अतः उपरोक्त दशाओं में आप सभी से सादर अपील है कि जो भी व्यक्ति खुद को उपरोक्त से परे मानते हों, राजनीति में आगे आएँ.

---प्रेमचंद्र ओझा 

रविवार, 17 अप्रैल 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए  
संपादन: डॉ. सुमीता                                                        नवांक 2, मार्च 2016
संवाद:
मार्च यानी फागुन का महीना. मार्च यानी वसंत के शबाब पर होने के दिन. मार्च यानी वर्ष के सबसे खुशनुमा दिन, प्रकृति के सँवरने के दिन, पेड़ों के नए पैहरन के दिन, सब किसिम के रंगों के दिन, फसलों के दिन, खुशियों के दिन, उत्सवों के दिन... हिंदु कैलेण्डर के मुताबिक खुशियों और रंगों से सराबोर होते हुए फाग के साज के साथ वर्षांत के दिन. हमारे देश में वित्तीय वर्ष का अंत भी मार्च में ही होता है.
मार्च ( 8 मार्च) अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए भी खास है. सहज प्रश्न उठता है कि क्या बाकी दिन महिलाओं के नहीं हैं? सच है कि मानव समाज में आदर्श स्थिति तो यही है कि ऐसे दिवस मनाने की जरूरत ही न हो. यह भी सच है कि महिलाओं के लिए बेहतर हुआ है समाज लेकिन यह भी सच है कि घर-परिवार के भीतर और बाहर स्त्रियों की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा खतरे से बाहर नहीं है. लिंग के आधार पर भेद-भाव जारी है. अशिक्षा, गैर-जागरूकता, आर्थिक परतंत्रता जैसी बेड़ियों को काट जैसे-जैसे स्त्री आगे बढ़ रही है, उसके दमन और शोषण के ज्यादा बारीक और शालीन औजार इजाद कर लिए जाते हैं. इन सभी नकारात्मक स्थितियों से पार पाने की जागरूकता स्त्रियों में आ सके, इस कोशिश के नाम महिला दिवस मनाने की परम्परा जारी रखना जरूरी है फिलहाल.
मानव समाज स्वस्थ और आनंदित तभी रह सकता है जब स्त्री और पुरुष के बीच अपनी-अपनी विशिष्टताओं को अक्षुण्ण रखते हुए भी बराबरी के स्तर पर सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व कायम रहे. बेहतरी-कमतरी की अहमन्यक जमीन पर पुरुष और स्त्री के बीच परम्परागत तौर पर चले आ रहे शोषक-शासित, बुर्जुआ-सर्वहारा जैसे सम्बन्ध समानता के सम पर सहजीवा और सहभोक्ता हो सके इसकी सत्कामना और सत्प्रयास के साथ यह अंक स्त्री स्वर को समर्पित है. साथ ही शान्ति-सद्भावना और हँसी-खुशी के रंगों से सराबोर होली के त्योहार के लिए आप सभी को शुभकामानाएँ.
*****
स्त्री-सुबोधिनी*
--- सुमीता
तू उनकी बेचैन भूख के क्रोध में फट जाने के डर के बदले
अपनी भूख के मर जाने से डर .

तेरी आत्मा को चींथते उनके बेपर्दा शब्दों की
नंगई से शर्मसार न हो
अपनी आत्मा पर पड़ने वाले उस बोझ से डर
जो धीरे-धीरे तुझे नैतिक गुलामी की
राह पर धकिया देने वाले हो .

पानी सम्भाले ही रखने की
जबरी जवाबदेही और अँगुलियाँ उठ जाने के
वितण्डावाद के बदले उसी पानी से पहले खाल फिर माँस-अस्थि-मज्जा के खा लिए जाने से डर .

रोज ही फचीटते उनके कपड़े
गर्द और गुबार के साथ-साथ
अपनी चटख खुशरंग हँसी और चैनोसुकून के
बदरंग हो जाने से डर .

उनकी नींदों में खलल पड़ जाने की शंका में
सहम-सहम कर साँसें लेने के बदले
तिल-तिल चौंक कर जागने और
अपनी नींदों के उड़ जाने से डर .

प्रताड़ना के अनगिनत तेज़ाबी उपक्रमों या
उनकी अदालतों के बेहिसाब प्रपंचों में
पिस जाने के डर के बदले
तू अपनी चेतना के सभी सुनहरे हर्फों और उजले सपनों की आत्महन्ता होने से डर .

उनकी घनघोर लिप्सा की प्रतिक्रिया में
निष्ठुर निरपेक्ष हो पलायन कर जाने या उनसा ही
हो जाने की साजिश का शिकार हो जाने से डर .

तू जीने से नहीं
रोज-ब-रोज मर जाने से डर.
[* मन्नू भंडारी जी की एक कहानी का शीर्षक]

******

जरा सोचिए ...
भाषा में भदेस होना
पुरुषों द्वारा आम बोलचाल में, मजाक में, बेध्यानी में, क्रोध में या हिकारत में उच्चारित गाली-गलौज के शब्दों पर जरा ध्यान दें. स्पष्ट हो जाएगा कि औरत जात से कितनी घृणा करते हैं वे. (औरतों की इज्जत करने का दम भरने वाले अपनी भाषा पर गौर फरमाएँ.) सभ्यता के विकास-क्रम में सत्ता-शक्ति-पूँजी पर एकाधिकार जमाते पुरुष के लिए खुद से इतर सबकुछ उसके साम्राज्य का हिस्सा था जिसमें सबसे महत्वपूर्ण थी स्त्री. लाजिमी है कि जिसपर शासन करना हो उसे बराबरी का दर्जा भला कैसे दिया जा सकता है? सो उसे दोयम दर्जे का, हीन और हेय बनाए रखने के किए अपमान-प्रताड़ना-घृणा का हथियार सबसे मुफीद था. और इसका शाब्दिक अभ्यास बनी गालियाँ. ऐसी प्रताड़नाओं से खोखली हो चुकी स्त्री अगली पीढ़ी को भाषा में गालियों की कुरूपता से बचा पाने में कभी सफल नहीं हो सकी. प्रख्यात लेखिका जर्मेन ग्रीयर के शब्दों में देह घृणा जितनी विकसित होती है, लैंगिक कर्म को त्यागने में असमर्थ रहने वाले उससे उतना ही डरते हैं और घृणा करते हैं; उसी अनुपात में भाषा में गालियाँ बढ़ती हैं.
दिलचस्प तो यह है कि एक ओर नारी-महिमा और उनके सौन्दर्य के स्तुति-गान की गाथाओं से साहित्य और इतिहास पटा पड़ा है लेकिन वास्तव में यह ऐसा ही है जैसे घूंघटों, नकाबों, कपड़ों और प्रसाधनों के अनेक तहों में छुपाई गई स्त्री-देह पुरुषों के हरेक वाक्य में लगातार बेदर्दी से उघाड़ी जाती है. भाषा के भद्देपन से कदरूप हुई स्त्री प्रतिक्रिया में जब बोलचाल की पुरुषों जैसी भंगिमा अख्तियार करती है तो और भी दयनीय हो जाती है. सबसे खतरनाक तो यही है कि स्त्रियाँ खुद भी अपने अस्तित्व, अपनी देह से उसी तरह घृणा करती हैं जैसे कि पुरुष. नहीं तो ऐसा कैसे होता कि मानव समाज में माँ-बहन की गालियाँ यूँ सहज स्वीकृत हो जातीं?
स्वस्थ समाज के लिए पुरुष और स्त्री दोनों की प्रेमपूर्ण बराबर भागीदारी और बराबर योगदान अपरिहार्य है जिसके लिए घृणा-कटुता-गैरबराबरी की हरेक बाधा खत्म कर डालने के सिवा कोई और विकल्प है ही नहीं. तो पुरुषो, आप कबतक असभ्य, बर्बर और अमानुष बने रहेंगे? स्त्रियो, अपने अस्तित्व के आत्मसम्मान के प्रति कबतक बेहोश रहेंगी आप?

चिड़िया
               --- लीना मल्होत्रा

महत्वाकांक्षाओं की चिड़िया
औरत की मुंडेर पर आ बैठी है
शिकारी ने
दम साध
तान ली है बन्दूक
अब अगर निशाना चूक गया
तो औरत मरेगी.
*****
समानार्थी
               --- बाबुषा कोहली
पहले सात फेरे 
तुम उपसर्ग की तरह रहना
दूसरे सात फेरे प्रत्यय-सा चलना
किसी समानार्थी शब्द की तरह जीवन भर रहना.
*****
हमारी कामना है कि खुशियों और आनंद की शतरंगी बौछारों से सराबोर होली हम सभी के लिए शुभकामनाओं की सौगात लेकर आए. होली सुरक्षित हो इसके लिए रासायनिक रंगों के स्थान पर हम प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करें. जैसे हल्दी घोलकर पीला, चुकंदर के रस से लाल रंग; बेसन, हल्दी और चन्दन पाउडर मिलाकर पीला, मेहंदी पाउडर से हरा, उड़हुल और टेसू (पलाश) के फूलों की सूखी पंखुड़ियाँ पीसकर लाल गुलाल बना कर उपयोग करें. इससे हम कई त्वचा रोगों और अन्य समस्याओं से भी बच सकेंगे. बाजार की मिठाइयों के बदले हम घर में बनी मिठाइयाँ खाएँ-खिलाएँ. एक होली गीत के साथ आप सभी को खुशरंग और सुरक्षित होली मुबारक ...
होली गीत
आई होली, भाई होली, छाई होली, रंग लाई होली
आई, भाई, छाई रंग लाई होली हो ...
पिचकारी खरीदा हमने हो, गुलाल बनाया हमने हो,
रंग डाला हमने हो, सबको सताया हमने हो,
आई होली ...
गुझिया बनाया हमने हो, सबको बाँटा हमने हो,
थोड़ा बचाया हमने हो, उसको खाया हमने हो,
आई होली ...

--- सर्जना ओझा (कक्षा 5)