समाधान
कलम, कला,
संवाद के लिए
संपादन: डॉ. सुमीता सन् 1985 से प्रकाशित नवांक 4, मई
2016
संवाद:
महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में गुरू-वंदना से पहले
दुष्ट-वंदना की है: ‘बंदऊ प्रथम दुष्ट के चरणा...’ दुष्टों की पहचान बताते हुए
उनके शब्द हैं: ‘परहित घृत जिनके मान माँखी ...’ यानी जिस तरह मक्खी अपनी जान देकर
भी घी में गिरकर घी खराब कर देती है वैसे ही दुष्ट जन दूसरों का नुकसान करने में
अपनी जान तक गवां देने को तत्पर रहते हैं.
दुष्टता की पहचान बहुधा आसान नहीं होती. लोभ, मोह, क्रोध या
अहंकार जैसे नकारात्मक भावों की तरह मानव मस्तिष्क में उत्पन्न हो जाने वाला कोई
अस्थाई भाव नहीं है यह. किन्हीं विशेष मानसिक बुनावट का परिणाम है दुष्टता जिससे
प्रभावित व्यक्ति द्वारा संपन्न अधिकतर कार्यों का परिणाम केवल नुकसान और
नकारात्मकता ही होती है. कई बार ऐसा भी होता है कि आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया के
आधार पर एक ही स्तर पर खड़े दीखते दो पक्षों में दुष्टता की ओर कौन-सा पक्ष है यह
तय कर पाना काफी कठिन होता है. ऐसी स्थितियों में सत्य और शुभ के पक्ष को चुन पाना
विवेकसम्मत धीरज की माँग करता है.
दुष्ट कौन? जो स्वार्थ और लालचवश धोखे से दूसरे की
संपत्ति-सुख-शान्ति-समृद्धि हड़पने की कोशिश करे, जो अपने सम्पर्क में आनेवाले
व्यक्तियों, खासकर अपने से छोटों व बच्चों को जानबूझकर गलत रास्ते पर प्रेरित करे,
जो उन्हें सदाचरण और सद्विचार से भटकाए, जो उनका शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और
भावनात्मक शोषण कर आनंदित हो... और यह सब करते हुए सहज मनोरंजन या उत्फुल्ल आनंद
का हवाला देकर स्वयं को न्यायोचित ठहराए, खुद पर दबाव महसूस होने पर खुद के बजाए
पीड़ित को दोषी साबित कर देने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दे...
स्वस्थ समाज के नासूर ऐसे दुष्ट हमारे आसपास कहीं भी मौजूद
हो सकते हैं. समाज की बेहतरी के लिए दुष्टता का शमन जरूरी है. जरूरी है कि हमारा
पक्ष स्पष्ट हो और बेहद जरूरी है कि हम सजग और चौकस रहें- बाहर भी और अपने भीतर
भी.
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परागण
तितली के होंठों में दबे हैं
दुनिया के सबसे सुन्दर प्रेम-पत्र
तितली एक उड़ता हुआ फूल है
हँसी किसी फूल की
उड़कर जाती है
एक उदास फूल के पास
उड़कर जाता है मन एक फूल का
उतरती है इच्छा किसी फूल में
एक फूल का स्वप्न
किसी फूल के स्वप्न में मिलता है
दो फूलों के बीच का समय
कल्पना है एक नए संसार की
तितली की तरह
सिरजने की उद्दात्तता भी होना चाहिए
एक संवदिया में
--- हेमन्त देवलेकर
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सवेरा फिर नहीं होता
सवेरा फिर नहीं होता
छींके से दूध पीकर गई बिल्ली
आश्वस्त है
उसका दबा-छिपा अन्दाज
निकलता है घरों से
बाहर ईश्वर का काहिलपन सूंघता है
इन्सानों की नंगी और बेमुरौवत सोच
जो कि पत्थरों को दी गई
हमारी जबान है
जबकि पत्थरों को चुना था
नदियों ने, पहाड़ों ने
अपने भरोसे के लिए.
--- नीलोत्पल
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पक्षधर
इन्सान है कि जनमता है
और विरोध के वातावरण में आ गिरता है:
उसकी पहली साँस संघर्ष का पैंतरा है
उसकी पहली चीख एक युद्ध का नारा है
जिसे वह जीवन भर लड़ेगा.
हमारा जन्म लेना ही पक्षधर बनना है,
जीना ही क्रमशः यह जानना है
कि युद्ध ठनना है
और अपनी पक्षधरता में
हमें पग-पग पर पहचानना है
कि अब से हमें हर क्षण में, हर वार में, हर क्षति में,
हर दुःख-दर्द, जय-पराजय, गति-प्रतिगति में
स्वयं अपनी नियति बन
अपने को जनना है.
ईश्वर
एक बार का कल्पक
और सनातन क्रान्ता है:
माँ- एक बार की जननी
और आजीवन ममता है:
पर उनकी कल्पना, कृपा और करुणा से
हम में यह क्षमता है
कि अपनी व्यथा और अपने संघर्ष में
अपने को अनुक्षण जनते चलें,
अनुक्षण अपने को परिक्रान्त करते हुए
अपनी नई नियति बनते चलें.
पक्षधर और चिरन्तन,
हमें लड़ना है निरन्तर,
आमरण अविराम –
पर सर्वदा जीवन के लिए:
अपनी हर साँस के साथ
पनपते इस विश्वास के साथ
कि हर दूसरे की हर साँस को
हम दिला सकेंगे और अधिक सहजता,
अनाकुल उन्मुक्ति, और गहरा उल्लास
अपनी पहली साँस और चीख के साथ
हम जिस जीवन के
पक्षधर बने अनजाने ही
आज होकर सयाने
उसे हम वरते हैं:
उसके पक्षधर हैं हम
इतने घने
कि उसी जीने और जिलाने के लिए
स्वेच्छा से मरते हैं!
---अज्ञेय
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जरा सोचिए ...
अफवाह
गर्म है ...
बातों से बातें निकलती हैं
और दूर तलक चलती जाती हैं. इस चलते जाने में बातों का रूप-रंग बदलता जाना सबसे
स्वभाविक होता है. उदाहरण के लिए छः व्यक्तियों के बीच बातचीत का एक नमूना देखिए:
जग्गू ने मोहन से कहा, मेरे पास एक अच्छा भूरा कुत्ता है. मोहन ने अनीता से कहा,
जग्गू के पास एक भूरा कुत्ता है. अनीता ने रफीक से कहा, जग्गू के पास एक गन्दा
भूरा कुत्ता है. रफीक ने श्याम से कहा, जग्गू के पास एक गन्दा कुत्ता है. श्याम ने
नफीसा से कहा, जग्गू के पास एक सड़ा कुत्ता है. नफीसा ने जग्गू से कहा, लोग कहते
हैं कि तुम सड़े कुत्ते हो. जग्गू बेचारा! चारों खाने चित्त...
सामान्यतः सत्य और तथ्य से
परे जो भी बेबुनियाद बातें लोगों के बीच आम हो जाती हैं, वे ही अफवाह कहलाती हैं.
चूंकि झूठ/अफवाह के पाँव नहीं, पंख होते हैं; इसलिए यह कितनी तेजी से फैलता हैं,
इसका हिसाब लगाना मुश्किल है. हम एक कोशिश करके देखते हैं: मान लेते हैं कि एक
व्यक्ति को कोई खबर मिली और पंद्रह मिनट में उसने तीन व्यक्तियों को इसे बताया.
अगली कड़ी में उन तीन व्यक्तियों ने अगले पंद्रह मिनट में तीन-तीन अन्य लोगों तक उस
खबर को बाँटा. यह सिलसिला यूँ ही आगे बढ़ता रहा तो आप जोड़ कर पाएँगे कि ढाई घंटे
में 88,573 लोगों तक यह खबर पहुँच चुकी है.
मनुष्य में सुनी-सुनाई
बातों पर सहज भरोसा कर लेने की प्रवृति होती है. कोई खबर सच है या झूठ इसकी फिक्र
आमतौर पर कोई नहीं करता है. जबकि इस प्रवृति का नाजायज फायदा उठाने वालों की भी
कमी नहीं है हमारे समाज में. कई बार ऐसा हुआ है कि स्वार्थलोलुप असामाजिक तत्वों
द्वारा सुनियोजित अफवाहों के माध्यम से भीड़ को उकसाकर संगीन अपराध तक करवा लिए गए
हैं. सोचने की जरूरत है कि बुद्धि व तर्क की नेमत होने के बावजूद हम सत्य और तथ्य
की छानबीन करने के बजाए कम या अधिक नुकसानदायक अफवाहों के फंदे में जब-तब क्यों और
कैसे फँस जाते हैं?
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