रविवार, 17 अप्रैल 2016

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए; नव अंक: 1

समाधान कलम, कला, संवाद के लिए
संपादन: डॉ. सुमीता                          वर्ष: 30+1, नव अंक: 1, वसंतपंचमी 2016
संवा:


महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की इन पंक्तियों से ज्ञान, विद्या और कला की देवी की प्रार्थना करते हुए हम नव वसंत का स्वागत करते हैं:
काट अन्ध-उर के बन्धन स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद तम-हर प्रकाश भर
             जगमग जग कर दे !
वर दे, वीणावादिनी वर दे.
[हे माँ! तू ज्ञान की रोशन नदी बहा दे कि अज्ञान और जड़ता की जाने कितनी परतों से जकड़े हमारे हृदय का अन्धकार कट सके. ईर्ष्या, द्वेष, कटुता के सभी कलुष पोंछ दे माँ कि हमारी दुनिया प्रेम-सौहार्द और शान्ति के प्रकाश से जगमगा उठे. हे वीणावादिनी माता सरस्वती! आप हमें आशीर्वाद दें कि हमारी चेतना में विद्या, बुद्धि और विवेक की लौ जलती रहे अहर्निश.]
विशेष है वसंत. ऋतुराज है. ऋत है. जीवन और मरण का अद्भुत संधिकाल है वसंत. जब धरती और हवा में वसंती रंग घुल जाए, तब हमारे दिलों के भी सभी सुगन्धित फूल खिल जाएँ कि हमारा संसार आनन्द और शान्ति के राग से गुंजरित हो जाए. इसी सत्कामना के साथ बड़े हर्ष से हम ‘समाधान’ आप से साझा कर रहे हैं.

विशिष्ट है ‘समाधान’. सन् 1985 से साहित्य, संस्कृति और वैचारिकी की धरोहर की जमीन पर नवोन्मेष का आह्वान है 'समाधान'. मानवता और बन्धुत्व पक्ष है इसका. शिव और शुभ की कामना के साथ विभिन्न विषयों और रूपाकारों में आपके बीच उपस्थित होता रहेगा.
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बचा रहेगा
धरी रह जाएँगी सारी की सारी
घृणाएँ, कटुताएँ
जलकर राख हो जाएगी
रस्सी की तरह ऐंठी हुई
सारी की सारी
ईर्ष्याएँ, अहंमन्यताएँ

बचा रहेगा
सिर्फ एक
प्यार के लिए पछाड़ें खाता
उठता, गिरता स्मृतियों का समुद्र. 
                       --- भगवत रावत

अग्निबीज
शहर-शहर सुलगे हैं अलाव
गाँव-गाँव कउड़े जले हैं
इस तरह फैली है आग
हर जगह अग्निबीज मनचले हैं.
                        ---डॉ. अनुपम

मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली पिछले सप्ताह इस असार संसार को अलविदा कह गए. उनके इन शे'रों से उन्हें समाधान समूह की श्रद्धांजलि समर्पित है:

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है
आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
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जरा सोचिए...  
हमारी उत्सवधर्मिता
अजब के उत्साही हम और गजब की हमारी उत्सवधर्मिता ! धर्म का अर्थ भले न जाने लेकिन धार्मिकता के गुमान में फूले न समाते ! धर्म प्रतिस्थापना का जुआ पीढ़ी-दर- पीढ़ी रिले रेस सा आगे बढ़ाते महान कार्य कर सकने के परम संतुष्टि भाव से गर्वोन्नत उन्मत्त हैं हम. फिर उत्सव के लिए कारण की दरकार ? इस प्रश्न की गुंजाइश ही कहाँ है ? अब तैंतीस करोड़ तो प्राचीन देवी देवता ठहरे, अर्वाचीन जाने कितने ?! जबकि साल में दिन केवल तीन सौ पैंसठ. बाकी शादी-विवाह आदि सोलह संस्कार, जन्मतिथि-पुण्यतिथि आदि हैं ही साथ में आस्था के प्रमाणन कार्यालय जैसे तमाम पूजास्थलों में दैनिक अर्ध्य-उत्सव की बहार. और हरेक उत्सव का पर्याय बन चुका है लाउडस्पीकर, डीजे, चीख-पुकार, चिल्ल-पों, शोर-शराबा... .  किसी की जान जाती हो तो जाए, हमारी बला से ! इस मामले में शहर से भी बदतर हालत है गाँवों की. सम्पन्न हुए हैं गाँव. बेहतर हुई है निम्न और निम्नतम आयवर्ग की माली हालत और इसी अनुपात में बढ़ी है खर्चने और प्रदर्शन करने की होड़. हालाँकि, आयवर्ग चाहे कोई भी हो, मानसिक दरिद्रता के मामले में अधिकांशतः कोई भेद नहीं है. किसी भी उत्सव में केवल पचास मीटर रेडियस के क्षेत्र में कम-से-कम पाँच जोड़े लाउडस्पीकर दिक्-दिगन्त में घमासान मचाते दीख जाना आम दृश्य है. सिर पर हथौड़े बजाते, कान फोड़ते डीजे व्यवसाय उत्तरोत्तर उत्कर्ष पर है.
किस कदर हिंसक हैं हम ?! और अत्याचारी ?! हम नवजात शिशुओं को भी नहीं बख्शते. जैसे साँप अपने अण्डे खा जाता है कुछ उसी की तरह हमारा भी आचरण है. बच्चे के जन्म की खुशी उसे चौबीस में से बीस घण्टे के औसत से कई दिनों तक लाउडस्पीकर पर सोहर सुनाकर मनाई जाती है यहाँ. बदले में बच्चे को मिलता है: कम उम्र में बहरापन, उच्च रक्तचाप, दिमाग का अविकसित रह जाना, कई अन्य शारीरिक और मानसिक बीमारियों के साथ दिमाग का कैन्सर जाने की सम्भावना. लगातार तेज आवाज का असर बच्चे, वयस्क, बूढ़े यानी सभी में एक जैसा ही होता है. डीजे के शोर से पड़ोसी दुबौली गाँव में सत्तर बर्षीय बुजुर्ग की मौत की खबर 17 फरवरी, 2016 के दैनिक जागरण (पृष्ठ 7) में छपी है. भूस्खलन और भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी ध्वनि-विस्फोट जिम्मेदार होते हैं. 
एक ओर मनुष्यता पृथ्वी और पर्यावरण बचा सकने की जद्दोजहद कर रही है, वहीं हम अहं-प्रदर्शन में प्रतियोगिता करते ध्वनि-प्रदूषण को खतरनाक स्तर तक बढ़ाए चले जा रहे हैं. स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि सरकार को भी कानून के चाबुक (अबतक असभ्य जानवर ही हैं हम) की जरूरत पड़ रही है. हाल ही में बिहार सरकार ने ध्वनि की उच्चतम सीमा और शोर करने की समय सीमा संबंधी कानून पारित कर सख्ती से लागू करने का फैसला किया है. इसके अनुसार रात दस बजे से सुबह छः बजे के बीच लाउडस्पीकर बजाना अपराध माना जाएगा. इसका उल्लंघन करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी. ध्वनि की उच्चतम सीमा मापी मानक यंत्रों से लैस सम्बन्धित महकमे की व्यवस्था सुचारु की जा रही है.
हम कैसे कमदिमागों का हुजूम हैं कि इक्कीसवी शताब्दी में पहुँचकर भी इतने ही सभ्य हो पाएँ हैं कि अक्लमंदी की किसी भी बात को फूहड़ हास्य में उड़ा देने  में अपनी शान समझते हैं. हम संगीत और शोर का फर्क नहीं जानते. हम आनन्द और उच्चश्रृंखल उन्मत्तता में फर्क नहीं जानते. खुशी और पूजा-अर्चना के नाम पर अपनी चिल्लाहट की लाठी से सबको पीट डालने का धृष्ट, भ्रष्ट और अश्लील आचरण हम कबतक दुहराए जाएँगे? क्या इस विषय पर आत्म-मन्थन कर सकने की बुद्धि नहीं हुई है हममें?


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सन् 1985 से समाधान सांस्कृतिक समूह के लिए डॉ. अनुपम द्वारा प्रकाशित.

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